ग्रेट इंडियन बस्टर्ड यानी गोडावण पक्षी को बचाने को लेकर देश में एक बार फिर बहस तेज हो गई है। हाल ही में सरकार ने गुजरात में इस दुर्लभ पक्षी के एक चूजे के जन्म को बड़ी सफलता बताया। इसे केंद्र सरकार की कोशिशों का परिणाम बताया गया, जिसके बाद राजनीतिक विवाद शुरू हो गया। कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने इस दावे पर सवाल उठाते हुए कहा कि गोडावण को बचाने की पहल पहले ही शुरू हो चुकी थी और इसका पूरा श्रेय किसी एक व्यक्ति को देना सही नहीं है।

यह मामला तब चर्चा में आया जब सरकार की तरफ से यह जानकारी दी गई कि लंबे समय बाद गुजरात में गोडावण का चूजा पैदा हुआ है। इसके बाद जयराम रमेश ने कहा कि उन्होंने साल 2010 में ही इस पक्षी के संरक्षण को लेकर कदम उठाने की बात कही थी। उन्होंने उस समय गुजरात सरकार को पत्र लिखकर इस पक्षी की घटती संख्या पर चिंता जताई थी और तुरंत कार्रवाई की मांग की थी।
2010 की पहल और आज का विवाद: क्या है सच्चाई?
जयराम रमेश के अनुसार, जब वह पर्यावरण मंत्री थे, तब उन्होंने 9 जून 2010 को गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री को पत्र लिखा था। इस पत्र में उन्होंने कच्छ के घास के मैदानों में गोडावण की कम होती संख्या को लेकर चेतावनी दी थी। उन्होंने कहा था कि अगर समय रहते जरूरी कदम नहीं उठाए गए, तो यह पक्षी पूरी तरह खत्म हो सकता है।
वहीं सरकार का कहना है कि हाल के वर्षों में गोडावण के संरक्षण के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए गए हैं, जिनका परिणाम अब सामने आ रहा है। सरकार ने खास तकनीक और योजनाओं के जरिए इस पक्षी को बचाने की कोशिश की है।
गोडावण पक्षी को बचाने के लिए एक खास ऑपरेशन भी किया गया, जिसमें राजस्थान से एक अंडे को लगभग 770 किलोमीटर दूर गुजरात लाया गया। इस अंडे को सुरक्षित रखने के लिए एक विशेष मशीन का इस्तेमाल किया गया और करीब 19 घंटे की यात्रा के बाद इसे कच्छ में एक मादा गोडावण के घोंसले में रखा गया। 26 मार्च को इस अंडे से चूजा निकला, जिसे अब उसकी देखभाल के लिए एक ‘फोस्टर मदर’ के पास रखा गया है।
गोडावण की स्थिति और संरक्षण की जरूरत क्यों है?
गोडावण पक्षी भारत के सबसे दुर्लभ पक्षियों में से एक है और इसकी संख्या बहुत तेजी से घट रही है। पर्यावरण मंत्रालय के अनुसार, गुजरात में अब केवल कुछ ही मादा गोडावण बची हैं और नर पक्षियों की संख्या लगभग खत्म हो चुकी है। ऐसे में प्राकृतिक तरीके से इनका प्रजनन होना बेहद मुश्किल हो गया है।
इसी कारण वैज्ञानिक और सरकार मिलकर नए तरीके अपना रहे हैं, ताकि इस पक्षी को बचाया जा सके। संरक्षण केंद्रों में इनकी संख्या धीरे-धीरे बढ़ रही है और उम्मीद की जा रही है कि आने वाले समय में इन्हें फिर से प्राकृतिक वातावरण में छोड़ा जाएगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि गोडावण को बचाना बेहद जरूरी है, क्योंकि यह भारत की जैव विविधता का महत्वपूर्ण हिस्सा है। अगर समय रहते इस पर ध्यान नहीं दिया गया, तो यह पक्षी हमेशा के लिए खत्म हो सकता है।
कुल मिलाकर, गोडावण संरक्षण को लेकर चल रहा यह विवाद हमें यह समझाता है कि पर्यावरण और वन्यजीवों की सुरक्षा राजनीति से ऊपर होनी चाहिए। इस दिशा में सभी को मिलकर काम करना होगा, तभी इस दुर्लभ पक्षी को बचाया जा सकता है।



