वन हेल्थ जागरूकता: मानव, पशु और पर्यावरण के तालमेल पर जिम्स में बड़ा कार्यक्रम
वन हेल्थ जागरूकता आज के समय में एक बेहद महत्वपूर्ण विषय बन चुका है, जिस पर पूरी दुनिया का ध्यान तेजी से बढ़ रहा है। बदलते पर्यावरण, बढ़ती बीमारियों और जीवनशैली में बदलाव के कारण अब यह जरूरी हो गया है कि मानव, पशु और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाए रखा जाए। इसी उद्देश्य के साथ ग्रेटर नोएडा स्थित जिम्स (GIMS) में विश्व स्वास्थ्य दिवस के अवसर पर एक विशेष कार्यक्रम का आयोजन किया गया, जिसमें विशेषज्ञों ने “वन हेल्थ जागरूकता” पर गहराई से चर्चा की।
मानव, पशु और पर्यावरण का आपसी संबंध
वन हेल्थ जागरूकता का मतलब है कि मानव स्वास्थ्य, पशुओं के स्वास्थ्य और पर्यावरण की स्थिति एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं। अगर इनमें से किसी एक में भी समस्या आती है, तो उसका प्रभाव बाकी दोनों पर भी पड़ता है।
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के डीडीजी, डीएम सेल के डॉ. प्रदीप खसनोबिस मौजूद रहे। उन्होंने अपने संबोधन में कहा कि आज के समय में स्वास्थ्य को लेकर सोचने का तरीका बदलना होगा। सिर्फ इंसानों के इलाज से काम नहीं चलेगा, बल्कि हमें पशुओं और पर्यावरण पर भी ध्यान देना होगा।
विशिष्ट अतिथि के रूप में जीबीयू के प्रो. राजीव वार्ष्णेय भी उपस्थित रहे, जिन्होंने इस विषय को और विस्तार से समझाया। उन्होंने कहा कि “वन हेल्थ जागरूकता” को बढ़ावा देने के लिए सभी क्षेत्रों को मिलकर काम करना होगा।
जिम्स के निदेशक डॉ. ब्रिगेडियर राकेश कुमार गुप्ता ने बताया कि बदलते समय में नई-नई बीमारियां सामने आ रही हैं, जिनसे निपटने के लिए एक समन्वित दृष्टिकोण बेहद जरूरी है।
बदलते समय में नई स्वास्थ्य चुनौतियां
आज की दुनिया में तेजी से हो रहे बदलावों के कारण कई नई समस्याएं सामने आ रही हैं। जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण, और पशुओं में फैलने वाली बीमारियां अब इंसानों तक भी पहुंच रही हैं। यही कारण है कि “वन हेल्थ जागरूकता” को बढ़ाना समय की सबसे बड़ी जरूरत बन गई है।
कार्यक्रम में एनसीडीसी की संयुक्त निदेशक डॉ. सिम्मी तिवारी, यूसीएमएस के निदेशक प्रो. अरुण कुमार शर्मा और सफदरजंग अस्पताल के निदेशक प्रो. डॉ. जुगल किशोर जैसे कई बड़े विशेषज्ञ मौजूद रहे। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि अगर हम समय रहते सावधान नहीं हुए, तो भविष्य में स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याएं और गंभीर हो सकती हैं।
“वन हेल्थ जागरूकता” के जरिए यह समझाया गया कि हमें अपने आसपास के वातावरण को साफ रखना, पशुओं की देखभाल करना और स्वास्थ्य नियमों का पालन करना कितना जरूरी है।
नुक्कड़ नाटक से जागरूकता का संदेश
इस कार्यक्रम का एक खास हिस्सा था नुक्कड़ नाटक, जो जिम्स के कम्युनिटी मेडिसिन विभाग की ओर से आयोजित किया गया। “नट की मढ़ैया” गांव में पैरामेडिकल छात्रों ने एक नाटक के माध्यम से लोगों को “वन हेल्थ जागरूकता” का महत्व समझाया।
इस नाटक के जरिए लोगों को बताया गया कि कैसे छोटी-छोटी लापरवाहियां बड़ी बीमारियों का कारण बन सकती हैं। साथ ही, विज्ञान को अपनाने और स्वच्छता बनाए रखने की अपील भी की गई।
गांव के लोगों ने इस नाटक को काफी पसंद किया और इससे जुड़ी जानकारी को समझने में रुचि दिखाई। इस तरह के प्रयास “वन हेल्थ जागरूकता” को जमीनी स्तर तक पहुंचाने में बहुत मददगार साबित होते हैं।
निष्कर्ष
अंत में यही कहा जा सकता है कि “वन हेल्थ जागरूकता” सिर्फ एक विचार नहीं, बल्कि एक जरूरी पहल है, जिसे अपनाकर हम अपने और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक सुरक्षित भविष्य बना सकते हैं।
मानव, पशु और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाए रखना अब एक विकल्प नहीं, बल्कि जरूरत बन चुका है। अगर हम आज से ही इस दिशा में काम करना शुरू करें, तो आने वाले समय में कई बड़ी स्वास्थ्य समस्याओं से बचा जा सकता है।
“वन हेल्थ जागरूकता” हमें यह सिखाती है कि हम सभी एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं और हमारी जिम्मेदारी है कि हम इस संतुलन को बनाए रखें।



