बारामती विधानसभा उपचुनाव: सुनेत्रा पवार का कांग्रेस से समर्थन मांगना, क्या बिना मुकाबले जीत संभव?
महाराष्ट्र की राजनीति में इन दिनों बारामती उपचुनाव को लेकर हलचल तेज हो गई है। यह सीट हमेशा से राजनीतिक रूप से काफी महत्वपूर्ण रही है, और इस बार का चुनाव कई कारणों से चर्चा में है।
राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) की अध्यक्ष सुनेत्रा पवार ने इस चुनाव को बिना मुकाबले जीतने की कोशिश में कांग्रेस से समर्थन मांगा है। उन्होंने कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष हर्षवर्धन सपकाल को फोन कर सहयोग की अपील की।
हालांकि, कांग्रेस की ओर से अभी तक कोई स्पष्ट जवाब सामने नहीं आया है। पार्टी के कुछ सूत्रों का कहना है कि कांग्रेस इस मांग का समर्थन करने के मूड में नहीं है। ऐसे में संभावना जताई जा रही है कि कांग्रेस अपना उम्मीदवार मैदान में उतार सकती है।
इस पूरे घटनाक्रम से साफ है कि बारामती उपचुनाव इस बार बेहद दिलचस्प होने वाला है।
सुनेत्रा पवार समर्थन को लेकर बढ़ी राजनीति
सुनेत्रा पवार समर्थन को लेकर लगातार प्रयास कर रही हैं। इससे पहले उन्होंने शिवसेना (उद्धव ठाकरे गुट) से भी समर्थन मांगा था। लेकिन वहां से भी अभी तक कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया नहीं आई है।

यह उपचुनाव उनके पति और पूर्व उपमुख्यमंत्री अजित पवार के निधन के कारण हो रहा है। अजित पवार का एक विमान हादसे में निधन हो गया था, जिससे यह सीट खाली हो गई।
इसी वजह से विपक्षी एनसीपी (शरद पवार गुट) ने यह फैसला किया है कि वह इस चुनाव में हिस्सा नहीं लेगी। उन्होंने इसे दिवंगत अजित पवार के सम्मान में लिया गया निर्णय बताया है।
लेकिन कांग्रेस का रुख अलग नजर आ रहा है। अगर कांग्रेस चुनाव लड़ती है, तो मुकाबला दिलचस्प हो सकता है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सुनेत्रा पवार समर्थन जुटाने में सफल होती हैं या नहीं, यह इस चुनाव का सबसे बड़ा सवाल है।
क्या होगा चुनाव का परिणाम?
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि बारामती उपचुनाव का परिणाम क्या होगा। क्या यह चुनाव बिना मुकाबले होगा, या फिर इसमें कड़ा मुकाबला देखने को मिलेगा?
सोमवार को नामांकन दाखिल करने का आखिरी दिन है, और इसी दिन स्थिति साफ हो जाएगी। सुनेत्रा पवार खुद नामांकन दाखिल करेंगी, जबकि कांग्रेस भी अपने उम्मीदवार को मैदान में उतार सकती है।
अगर कांग्रेस चुनाव लड़ती है, तो यह मुकाबला काफी रोचक हो जाएगा। वहीं अगर कांग्रेस समर्थन दे देती है, तो सुनेत्रा पवार की जीत लगभग तय मानी जा सकती है।
बारामती सीट का इतिहास भी काफी खास रहा है। अजित पवार यहां से आठ बार विधायक रह चुके थे और उन्होंने बड़े अंतर से जीत हासिल की थी।
ऐसे में यह सीट सिर्फ एक चुनाव नहीं, बल्कि एक राजनीतिक प्रतिष्ठा का सवाल भी बन चुकी है। आने वाले दिनों में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि राजनीतिक दल क्या रणनीति अपनाते हैं और जनता किसे अपना समर्थन देती है।



